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👉 साल 2026 में होली 3 मार्च (मंगलवार) को मनाई जाएगी।
👉 2 मार्च 2026 (सोमवार) को होलिका दहन होगा।
होली हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह तिथि वसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक है। प्रकृति में नई ऊर्जा, नई फसल और नई शुरुआत का समय — और इसी के साथ शुरू होता है भारत का सबसे रंगीन और भावनात्मक उत्सव।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे:
होली भारत का प्रमुख वसंतोत्सव है। यह केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि अच्छाई की बुराई पर विजय, प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
इस दिन लोग एक-दूसरे को रंग और गुलाल लगाकर शुभकामनाएँ देते हैं। मन के गिले-शिकवे मिटाकर नए संबंधों की शुरुआत की जाती है।

होली का इतिहास प्राचीन भारत से जुड़ा हुआ है। इसका उल्लेख कई पुराणों और संस्कृत ग्रंथों में मिलता है।
भक्ति आंदोलन के समय होली को श्रीकृष्ण भक्ति से जोड़ा गया। विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र में यह उत्सव अत्यंत लोकप्रिय हुआ।
आज होली केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन चुकी है।
होली की मूल कथा भक्त प्रह्लाद और उनकी बुआ होलिका से जुड़ी है। यह कथा धर्म, भक्ति और सत्य की शक्ति को दर्शाती है।
प्रह्लाद के पिता हिरण्यकश्यप एक शक्तिशाली असुर राजा था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा से वरदान प्राप्त किया था कि वह न किसी मनुष्य से मरेगा, न किसी पशु से; न दिन में, न रात में; न घर के अंदर, न बाहर; न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से।
इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने स्वयं को ईश्वर घोषित कर दिया और पूरे राज्य में आदेश दिया कि उसकी ही पूजा की जाए।
लेकिन उसका पुत्र प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। वह हर समय विष्णु का नाम जपता था और अपने मित्रों को भी भक्ति का मार्ग सिखाता था।
हिरण्यकश्यप ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, पर जब प्रह्लाद नहीं माना तो उसने उसे दंडित करना शुरू किया।
राजा ने प्रह्लाद को मारने के कई प्रयास किए:
लेकिन हर बार भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया।
अंततः हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की सहायता ली। होलिका को वरदान प्राप्त था कि अग्नि उसे नहीं जला सकती। योजना बनाई गई कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठेगी, जिससे प्रह्लाद जल जाएगा और वह सुरक्षित बच जाएगी।
होलिका अग्नि में बैठी, लेकिन जैसे ही अग्नि प्रज्वलित हुई, दैवीय शक्ति ने परिस्थिति बदल दी।
अहंकार और अधर्म के कारण होलिका स्वयं अग्नि में भस्म हो गई, जबकि प्रह्लाद भगवान के नाम का स्मरण करते हुए सुरक्षित बाहर आ गए।
यह कथा स्पष्ट करती है:
👉 इसी घटना की स्मृति में हर वर्ष होलिका दहन मनाया जाता है।
होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि गहरा आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतीक है।
यह प्रह्लाद की भक्ति और सत्य की विजय का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि अन्याय कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः धर्म की जीत होती है।
अग्नि को शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन के माध्यम से लोग अपने भीतर की ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध जैसी नकारात्मक भावनाओं को त्यागने का संकल्प लेते हैं।
होलिका दहन फाल्गुन पूर्णिमा की रात को होता है, जो ऋतु परिवर्तन का समय है। यह सर्दी के अंत और वसंत के स्वागत का प्रतीक है — यानी नई ऊर्जा और नए अवसरों की शुरुआत।
गांवों और शहरों में लोग एकत्र होकर लकड़ियां और उपले इकट्ठा करते हैं। पूजा के बाद अग्नि प्रज्वलित की जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में:
यह सामूहिक आयोजन सामाजिक एकता और सांस्कृतिक परंपराओं को मजबूत करता है।
प्रह्लाद और होलिका की कथा हमें केवल एक पौराणिक घटना नहीं बताती, बल्कि जीवन का गहरा सिद्धांत सिखाती है — सत्य, भक्ति और धैर्य की शक्ति सबसे बड़ी होती है।
इसी विश्वास के साथ हर वर्ष होलिका दहन हमें अपने भीतर की बुराइयों को जलाकर नई शुरुआत करने की प्रेरणा देता है।
रंग केवल खेल नहीं, बल्कि प्रतीक हैं:
रंग भेदभाव मिटाते हैं। इस दिन जाति, वर्ग और धर्म की सीमाएँ पीछे छूट जाती हैं।
ब्रज क्षेत्र — मथुरा, वृंदावन और बरसाना — को भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि और लीला-स्थली माना जाता है। यही कारण है कि यहाँ मनाई जाने वाली होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवंत आध्यात्मिक परंपरा है।
ब्रज में होली का उत्सव सामान्यतः 7 से 10 दिनों तक चलता है। हर दिन अलग-अलग मंदिरों और स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं, जिनमें भक्ति, संगीत, नृत्य और रंगों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

ब्रज की सबसे प्रसिद्ध परंपरा है लठमार होली। यह मुख्यतः बरसाना (राधा रानी की नगरी) और नंदगांव में मनाई जाती है।
यह परंपरा राधा और कृष्ण की प्रेम-लीला का प्रतीक है। पूरा वातावरण हँसी, गीत और पारंपरिक लोकसंगीत से गूंज उठता है।
बांके बिहारी मंदिर में मनाई जाने वाली फूलों की होली अत्यंत आकर्षक होती है।
यह आयोजन दर्शाता है कि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि प्रेम और भक्ति का उत्सव है।

कुछ वर्ष पूर्व तक वृंदावन में विधवाओं को सामाजिक रूप से होली खेलने की अनुमति नहीं थी। लेकिन अब यहाँ विधवाएँ भी रंगों के साथ होली मनाती हैं।
यह आयोजन ब्रज की होली को और भी भावनात्मक और प्रेरणादायक बना देता है।
ब्रज की होली श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित होती है।
यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जिसमें श्रद्धालु स्वयं को द्वापर युग की कृष्ण लीला का साक्षी महसूस करते हैं।
ब्रज में होली केवल रंगों का खेल नहीं है। यहाँ यह:
जब हजारों लोग “राधे-राधे” और “श्याम नाम” का उच्चारण करते हुए रंगों में सराबोर होते हैं, तब ब्रज की होली एक अलौकिक अनुभव बन जाती है।
इसीलिए कहा जाता है —
अगर असली होली देखनी हो, तो ब्रज की होली का अनुभव अवश्य करें। 🌸
भारत में होली अलग-अलग नामों और परंपराओं से मनाई जाती है:
यह विविधता भारत की सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाती है।
आजकल रासायनिक रंग त्वचा और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
जिम्मेदारी से मनाई गई होली ही सच्ची होली है।
🔥 होलिका दहन बुराई के अंत का प्रतीक है।
🎨 रंगों की होली सामाजिक एकता को मजबूत करती है।
🏵 ब्रज की होली धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से विशेष है।
🌱 पर्यावरण-अनुकूल होली समय की आवश्यकता है।
1. 2026 में होली कब है?
3 मार्च 2026 को रंगों की होली और 2 मार्च को होलिका दहन।
2. होली क्यों मनाई जाती है?
बुराई पर अच्छाई की जीत और वसंत ऋतु के स्वागत के लिए।
3. होलिका दहन का क्या अर्थ है?
यह प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के दहन की स्मृति में मनाया जाता है।
4. ब्रज की होली क्यों प्रसिद्ध है?
कृष्ण लीला, लठमार परंपरा और 7–10 दिन तक चलने वाले उत्सव के कारण।
5. सुरक्षित होली कैसे मनाएं?
प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें, पानी बचाएं और किसी को जबरदस्ती रंग न लगाएं।
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति, आस्था और एकता का उत्सव है।
जब हम इसे जिम्मेदारी और प्रेम के साथ मनाते हैं, तब इसकी सुंदरता और बढ़ जाती है।
👉 इस बार 2026 की होली को सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल बनाएं।
👉 इस जानकारी को अपने मित्रों और परिवार के साथ साझा करें।
आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएँ!